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नई शिक्षा नीति 2020 की तीसरी वर्षगांठ …. अभिभावक संघ ने कहा “नई शिक्षा नीति विद्यार्थियों और अभिभावकों के अधिकारों के खिलाफ”

इस नीति में अभिभावकों को समानता का अधिकार नहीं, यह नीति केवल शिक्षा के दुकानदारों को से रही है संरक्षण - अभिषेक जैन बिट्टू

जयपुर। नई शिक्षा नीति – 2020 की तीसरी वर्षगांठ को लेकर केंद्र सरकार के मंत्रीगण और एक पार्टी विशेष के द्वारा देशभर में प्रचार-प्रसार का अभियान चलाया जा रहा है। जिसको लेकर अभिभावकों के संगठन संयुक्त अभिभावक संघ ने शनिवार को विज्ञप्ति जारी कर ” नई शिक्षा नीति 2020 पर सवाल खड़े करते हुए कहा की यह नीति विधार्थियो और अभिभावकों के अधिकारों के खिलाफ है और यह नीति अभिभावकों को ना समानता का अधिकार दे रही है और सुझावों का अधिकार दे रही है। केंद्र सरकार केवल शिक्षा के दुकानदारों का पालन पोषण कर अभिभावकों और विद्यार्थियों को गुमराह कर रही है। देश में बेहतर शिक्षा व्यवस्था को लेकर बनाई गई नई शिक्षा नीति में अभिभावकों के सुझावों, प्रस्तावों और समस्याओं को भी स्थान देना चाहिए था किंतु पिछले 3 वर्षो से अभिभावकों की मांगों को सुना नही जा रहा है। जिनको नई शिक्षा नीति का लाभ मिलना चाहिए अगर उन लोगों को ही स्थान नही मिलेगा तो वह नीति केसे कारगर साबित होगी, कैसे जन-जन तक पहुंचेगी। आज शिक्षा के नाम पर व्यापार करने वाले दुकानदारों ने गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए शिक्षा के द्वार तक बंद कर दिए है। ऐसे में अगर सरकार केवल नीतियों का गुणगान करे तो यह केवल अभिभावकों के आत्म सम्मान के साथ धोखा है, विश्वासघात है। यह शिक्षा नीति नही अभिभावकों और विद्यार्थियों को गुमराह करने की रीति है। जिसकी आड़ में केवल शिक्षा के दुकानदारों को संरक्षण दिया जा रहा है।

संयुक्त अभिभावक संघ प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा की जब भी देश में कोई नीति बनाई जाती है तो उसमें सभी वर्गों को शामिल किया जाता है किंतु नई शिक्षा नीति 2020 में केंद्र सरकार ने प्रमुख दो वर्गों को छोड़कर यह नीति देश पर थोप दी है। जिन लोगों को ध्यान में रखकर यह नीति बनाई गई थी वह अभिभावक और विधार्थी वर्ग था, जिनके सुझावों को नई नीति में आजतक भी शामिल ही नही किया जा गया। इस तरह की नीति केवल शिक्षा छीनने का काम कर सकती है, देने का काम नही कर सकती है और स्पष्ट शब्दों में कहें तो अब यह नीति मुनाफाखोरों और माफियाओं का हथियार बनकर रह गई है। आज भी देश की आधी आबादी के बच्चों तक शिक्षा नही पहुंच रही है, निजी और सरकारी स्कूलों में बच्चों के साथ अत्याचार हो रहे है, बच्चियों की अस्मिता के साथ खिलवाड़ हो रहे है, निजी स्कूल शिक्षा के नाम पर मनमानी फीस वसूल रहे है, पिकनिक के नाम पर हजारों रु खर्च करवा रहे है। जो किताबें हजार या 15 सौ रु में आती थी आज उन्ही किताबों का मूल्य 6 से 10 हजार रु तक पहुंच गया है। यह शिक्षा नीति है या लूट नीति है।

अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा की बेसक केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति की तीसरी वर्षगांठ मना रही हो किंतु यह शिक्षा नीति विधार्थियो और अभिभावकों के आत्मसम्मान के खिलाफ है। आज भले ही अभिभावकों में जानकारी, जागरूकता और एकजुटता का अभाव हो किंतु वह दिन दूर नही जब अभिभावक इन सरकारों की लूट नीति को समझेंगे और सरकार सहित शिक्षा के नाम पर व्यापार चलाने वालों को मुंहतोड़ जवाब देगे। संयुक्त अभिभावक संघ पिछले 3 वर्षो से केवल अभिभावकों में जागरूकता फैलने और उन्हें एकजुट करने का काम कर रही है। इस अभियान में काफी हद तक सफलता भी मिल चुकी है।

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