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क्या है रुद्राक्ष, कब और कैसे करें धारण, जानते है वास्तु शास्त्री सुमित्राजी से रुद्राक्ष का महत्व

क्या है रुद्राक्ष, कब और कैसे करें धारण, क्या है महत्व 
रुद्राक्ष का अर्थ है – रूद्र का अक्ष। माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के अश्रुओं से हुई है। रुद्राक्ष को प्राचीन काल से आभूषण के रूपमें,सुरक्षा के लिए, ग्रह शांति के लिए और आध्यात्मिक लाभ के लिए प्रयोग किया जाता रहा है। कुल मिलाकर मुख्य रूप से सत्तरह प्रकार के रुद्राक्ष पाए जाते हैं, परन्तु ग्यारह प्रकार के रुद्राक्ष विशेष रूप से प्रयोग में आते हैं। रुद्राक्ष का लाभ अदभुत होता है और प्रभाव अचूक।
कब धारण करें
रुद्राक्ष धारण करने का सबसे उचित समय सावन और शिवरात्रि है। इसके अलावा इसे सोमवार को भी धारण किया जा सकता है।
क्या हैं नियम 
– रुद्राक्ष कलाई , कंठ और ह्रदय पर धारण किया जा सकता है।
– कलाई में बारह, कंठ में छत्तीस और ह्रदय पर एक सौ आठ दानो को धारण करना चाहिए
– एक दाना भी धारण कर सकते हैं  पर यह दाना ह्रदय तक होना चाहिए तथा लाल धागे  में होना चाहिए.
-सावन में, सोमवार को और शिवरात्री के दिन रुद्राक्ष धारण करना सर्वोत्तम होता है
-रुद्राक्ष धारण करने के पूर्व उसे शिव जी को समर्पित करना चाहिए तथा उसी माला या रुद्राक्ष पर मंत्र जाप करना चाहिए
विभिन्न रुद्राक्ष और उनका महत्व-
एक मुखी – यह साक्षात शिव का स्वरुप माना जाता है.
दो मुखी- यह अर्धनारीश्वर स्वरुप माना जाता है.
तीन मुखी- यह रुद्राक्ष अग्नि और तेज का स्वरुप होता है
चार मुखी- यह रुद्राक्ष ब्रह्मा का स्वरुप माना जाता है
पांच मुखी- इसको कालाग्नि भी कहा जाता है
छह मुखी- इसको भगवान कार्तिकेय का स्वरुप माना जाता है.
सात मुखी- यह सप्तमातृका तथा सप्तऋषियों का स्वरुप माना जाता है.
आठ मुखी- यह अष्टदेवियों का स्वरुप है तथा इसको धारण करने से अष्टसिद्धियाँ प्राप्त होती हैं
नौमुखी रुद्राक्ष : नौ दुर्गा तथा भैरव इसके देवता हैं
 दसमुखी रुद्राक्ष : भगवान विष्णु, १०  दिक्पाल तथा दश महाविद्याएं देवता हैं।
ग्यारह मुखी- एकादश मुखी रुद्राक्ष स्वयं शिव का स्वरुप माना जाता है।

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